लगातार 30 साल गृहयुद्ध की त्रासदी झेलते दक्षिण-पूर्व एशियाई देश कम्बोडिया को काफी जद्दोजहद के बाद 1993 में थोड़ी राहत मिली जब संयुक्त राष्ट्र पर्यवेक्षकों की देखरेख में चुनाव हुए और मिली-जुली सरकार बन गई। सरकार में शामिल दोनों पक्ष तो एक दूसरे के प्रबल विरोधी थे, लेकिन चूंकि उन्हें चीन समर्थित शक्तिशाली ख्मेर रूज छापामारों से मिलकर लड़ना था, इसलिए साझा सरकार बनाने को राजी हो गये।

प्रधानमंत्री के दो पद बनाए गये - एक पद मिला वियतनाम समर्थित कम्युनिस्ट पार्टी के नेता हुन सेन को और दूसरा मिला कम्बोडिया के सबसे पुराने शासक राजकुमार नरोत्तम सिंहानुक के पुत्र राजकुमार रणरिद्ध को। बाकी मंत्रियों के पदों में हुन सेन की पीपुल्स पार्टी और सिंहानुक की फन्सीन्पेक को बराबर की हिस्सेदारी दी गई। लेकिन सरकार के गठन के ही समय जो असंतोष उभरकर सामने आया वह खत्म होने के बजाए बढ़ते-बढ़ते आज इस स्थिति में आ गया है कि फिर से गृह युद्ध का माहौल बन गया है।

सरकार में शामिल दोनों पक्षों के बीच बढ़ता तनाव जल्द ही वो दिन लाने वाला है, जिससे उबारने की कोशिश 1993 में की गई थी। श्री हुन सेन को रणरिद्ध के समर्थकों द्वारा तख्ता पलट करके उनकी पार्टी को सत्ता से अलग करने का षड्यंत्र किये जाने की आशंका है। उन्होंने पार्टी के लोगों को सावधान रहने को कह दिया है और राजकुमार रणरिद्ध को भी चेतावनी दे दी गई है कि इस तरह की किसी योजना की गंध मिलते ही सेना कमान संभाल लेगी।

रक्षा और आंतरिक सुरक्षा मंत्रालय भी अपने जिम्मे होने के कारण हुन सेन की पकड़ काफी मजबूत है। राजकुमार रणरिद्ध का कहना है कि वे तो कहने भर के लिए प्रधानमंत्री हैं, वास्तव में उनके हाथ में कुछ नहीं है। उनका आरोप है कि शीर्ष मंत्रालय हुन सेन ने अपने पास रखा है और यह मुद्दा 1993 में ही उन्होंने उठाया था, जब संयुक्त राष्ट्र पर्यवेक्षक मौजूद थे। रणरिद्ध के मुताबिक संयुक्त राष्ट्र पर्यवेक्षकों ने यह कह कर टाल दिया कि इसका हल आपसी राय-मशविरे से निकाला जाए, लेकिन आज तक हुन सेन ने सत्ता में उनकी हिस्सेदारी नहीं होने दी, न ही किसी महत्वपूर्ण मंत्रालय में अपनी पार्टी के लोगों को सौंपा है और उनकी पार्टी के मंत्रियों की संख्या भी ज्यादा है। फन्सीन्पेक को कहने भर के लिए प्रतिनिधित्व दिया गया है।

कम्बोडिया के सबसे निकटस्थ पड़ोसी थाईलैंड के अखबार 'बैंकाक टाईम्स' ने दोनों पक्षों के अत्यंत विश्वसनीय सूत्रों के हवाले से यह वृत्तांत छापा है। थाईलैंड की कम्बोडिया के अंदरूनी मामले में दखलंदाजी रही है। 1978 के दिसम्बर में जब वियतनामी सेना की बदौलत हुन सेन ने ख्मेर रूज शासक पोल पोट को अपदस्थ किया तो पोल पोट ने थाईलैंड में शरण ली और 1975 में पोल पोट द्वारा अपदस्थ किये जाने के बाद राजकुमार नरोत्तम सिंहानुक के नजदीकी संबंधियों ने भी थाईलैंड भागकर अपनी जान बचाई थी। उसके बाद ख्मेर छापामारों के लिए चीन से हथियारों की आपूर्ति थाईलैंड के जरिये होती रही जो आज भी बदस्तूर कायम है।

स्वतंत्र विचारधारा के कम्बोडिया के सर्वाधिक प्रचारित 'नाम्पेन्ह पोस्ट' के मुताबिक अंतिम समय में अपने देश को फिर से पहले वाली हालत में जाते देख सिंहानुक की तकलीफ और बढ़ती जा रही है। क्योंकि ख्मेर रूज ने दक्षिण कम्बोडिया और अपने प्रभाव वाले अन्य इलाकों में पुलिस व सैनिक ठिकानों पर हमले तेज कर दिये हैं।

इस बीच पोल पोट की मृत्यु की खबर से ख्मेर छापामारों का मनोबल कमजोर अवश्य हुआ, लेकिन एक कमांडर द्वारा कम्बोडिया सरकार की ओर से उड़ाई गई अफवाह बताकर खंडन किये जाने से छापामार पुनः अपने अभियान में जुट गये हैं। 1993 से पहले जब पूरी तरह वियतनामी सेना की बदौलत हुन सेन के नेतृत्व में सरकार चल रही थी, तब भी सरकारी सैनिकों के लिए ख्मेर रूज हमलों का करारा जवाब देना महंगा पड़ता था और उस स्थिति में आज भी कोई अंतर नहीं पड़ा है।

शीत युद्ध के दौरान अमरीका और सोवियत संघ ने अपना वर्चस्व कायम करने की लड़ाई में जिन देशों को मोहरा बनाया उसमें एक कम्बोडिया भी है। वियतनाम की शर्मनाक हार के बाद अमरीका ने अपने को इस क्षेत्र की राजनीति से अलग कर लिया और उसके बाद मामला सोवियत संघ और चीन के बीच रह गया। चीन का हस्तक्षेप बिल्कुल सीधा रहा और सोवियत संघ की तूती वियतनाम के जरिए कायम रही। सोवियत संघ के बिखर जाने के बावजूद कम्बोडिया में दबंग हैसियत कम्युनिस्टों की ही है।

दरअसल 1978 में ख्मेर रूज शासन के पतन के बाद से कम्बोडिया में चीन की एक नहीं चल पायी, जबकि चीनी शासकों ने राजकुमार सिंहानुक के भी बड़े शुभचिंतक होने का स्वांग रचा, क्योंकि श्री सिंहानुक की अंतर्राष्ट्रीय छवि अच्छी रही है और उन्हें राष्ट्राध्यक्ष बनाने पर किसी देश को आपत्ति नहीं होती तथा उसी बहाने 1975 की तरह फिर से ख्मेर रूज राजकुमार सिंहानुक की कमजोरी का फायदा उठाकर कम्बोडिया पर कब्जा कर लेता। 1975 से 1978 तक का ख्मेर रूज शासनकाल का इतिहास खून से रंगा है।