आजादी के 49 वर्ष गुजर जाने के बावजूद 58 करोड़ वयस्क और छः करोड़ बच्चे गुलामी के दिनों से भी बदतर जिंदगी जी रहे हैं। एक ओर हम 21वीं सदी की दहलीज पर कदम रखने की होड़ में शामिल होने का दम भरते हैं, दूसरी ओर चिराग तले अंधेरा रहता है। पैदा होते ही बंधुआ मजदूरों की जिंदगी गिरवी रख दी जाती है और अंतिम सांस लेने तक वे बंधुआ ही बने रहते हैं। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बंधुआ उन्मूलन अभियान चलाने वाले बंधुआ मुक्ति मोर्चा के अध्यक्ष स्वामी अग्निवेश ने कहा, 'हम जैसे-जैसे सभ्य और विकसित होते जा रहे हैं, बंधुआ मजदूरों की संख्या में लगातार वृद्धि होती जा रही है।' संयुक्त राष्ट्र ने इसे आधुनिक दासता करार दिया है और स्वामी जी का कहना है कि अगर संयुक्त राष्ट्र की विभिन्न एजेंसियों द्वारा इस मद में सहायता न की गयी होती तो जिस तरह का असहयोगपूर्ण रवैया प्रशासन का रहा है, वैसे में इस अभियान को चलाने वाले हताश हो गए होते।

स्वामी अग्निवेश ने बंधुआ और बाल मजदूरी के विरुद्ध नागरिक आयोग भी बना रखा है जिसके अध्यक्ष हैं न्यायमूर्ति (अवकाश प्राप्त) वी.आर. कृष्ण अय्यर और संयोजक स्वामी जी स्वयं हैं।

हाल ही में इन्होंने काफी जद्दोजहद के बाद इलाहाबाद कालीन उद्योग में फंसे 18 बाल बंधुआ मजदूरों को मुक्त कराया है जिनमें से अधिकांश बिहार के हैं। बच्चों से परिचय कराने के बाद स्वामी जी ने काफी दुःख भरे स्वर में कहा कि इस समस्या को सरकार बिल्कुल हल्के ढंग से ले रही है। इसमें राजनीतिक इच्छाशक्ति का अभाव है। उन्होंने बताया कि अगर केन्द्र सरकार ने इसे गंभीरता से लिया होता तो बंधुआ मजदूरी उन्मूलन के लिए तय 850 करोड़ रुपये में से अब तक मात्र 30 करोड़ रुपए ही खर्च न हुए होते। स्वामी अग्निवेश ने कहा कि उनके मोर्चे से जुड़े सामाजिक कार्यकर्ता इस अभियान को अपनी जवाबदेही मानकर चला रहे हैं और उन्हीं की बदौलत बंधुआ मुक्ति मोर्चा ने छः करोड़ बाल श्रमिकों को दासता से मुक्त कराकर स्कूल में दाखिल कराने और उनके लिए रोजाना एक किलोग्राम खाद्यान्न की व्यवस्था करने का बीड़ा उठाया है। उन्हें इस बात का अफसोस है कि सरकारों से अपेक्षित सहायता नहीं मिल रही है, अगर वह मिल जाए तो और भी जल्द इस पुनीत काम को संपन्न करा लिया जाए।

सर्वोच्च न्यायालय और इलाहाबाद उच्च न्यायालय के प्रति बंधुआ मुक्ति अभियान से जुड़े सभी सामाजिक संगठन आभार व्यक्त करते हैं, क्योंकि उन्हें लगता है कि अधिकांश बच्चों को मुक्त कराने में जिला प्रशासन ने इन न्यायालयों के फैसले के बाद तत्परता दिखायी। सर्वोच्च न्यायालय के हाल के फैसले से स्वामी अग्निवेश और कैलाश सत्यार्थी का मनोबल काफी बढ़ा है जिसमें आगरा तथा फिरोजाबाद में चूड़ी उद्योग में फंसे बाल मजदूरों की मुक्ति के संबंध में वहां के जिलाधिकारियों से विस्तृत विवरण मांगा गया है। श्री सत्यार्थी दक्षिण एशियाई बाल श्रमिक मुक्ति अभियान के संयोजक हैं और इन्होंने बनारस के कालीन उद्योग से और सर्कस से बड़ी संख्या में बच्चों को मुक्त कराया है, साथ-साथ नेपाल में भी इन्हें अपने प्रयासों में सफलता मिली है। बनारस और इलाहाबाद के कालीन उद्योग के बाद नंबर आता है आगरा और फिरोजाबाद की कांच की चूड़ियों के उद्योग का जहां बाल श्रमिकों की संख्या सबसे ज्यादा है। ये कालीन और कांच की चूड़ियां विश्व भर में प्रसिद्ध हैं लेकिन कोई नहीं जानता कि इनकी खूबसूरती लाखों मासूम जिंदगियों के रक्तरंजित क्षणों की पैदाइश है।

यों तो भारतीय संविधान के अनुच्छेद 23 में सभी प्रकार की दासता समाप्त करने की बात घोषित की गयी है, लेकिन बंधुआ मजदूरी (उन्मूलन) अधिनियम महज 20 वर्ष पहले (9 फरवरी, 1976) पारित हुआ। इस अधिनियम के कार्यान्वयन में लापरवाही देखकर बंधुआ मुक्ति मोर्चा की ओर से सर्वोच्च न्यायालय की मदद ली गयी और न्यायालय ने 1983 में अपने फैसले में केन्द्र सरकार तथा सभी प्रांतीय सरकारों को हर प्रकार की दासता तुरंत समाप्त करने का निर्देश दिया, लेकिन स्वामी जी को मलाल है कि उस फैसले के दस वर्ष गुजर जाने के बावजूद अमल में चुस्ती नहीं देखी जा रही है।

प्राप्त आंकड़ों के मुताबिक अकेले दिल्ली में ही कम-से-कम पांच लाख से ज्यादा बंधुआ मजदूर हैं। बिहार, राजस्थान, पूर्वी उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश से रोजी की तलाश में आए ये मजदूर ज्यादातर निर्माण कार्य में लगे हैं, जिन्हें घोषित 60 रुपए दैनिक मजदूरी के बजाय मात्र 45 रुपए मिलते हैं। स्वामी अग्निवेश का आरोप है कि दिल्ली सरकार को कई ज्ञापन दिए गए, लेकिन इस दिशा में कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया। और तो और, इस वक्त संसद भवन परिसर में भी 300 मजदूर संसद पुस्तकालय निर्माण कार्य में बंधक हैं। हालांकि जब दिल्ली के मुख्यमंत्री साहिब सिंह वर्मा से पूछा गया तो उन्होंने इस बात से इनकार किया कि इस दिशा में कोई कदम नहीं उठाया गया है। उन्होंने कहा कि बाहर से आने वाले मजदूरों को आने से रोका तो नहीं जा सकता, इसलिए समस्या का तत्काल हल तो संभव नहीं है, लेकिन सरकार उन्हें बसाने की व्यवस्था के साथ-साथ यह भी सुनिश्चित कर रही है कि मजदूरों को उनकी मेहनत का उचित मूल्य मिले।

देश में 28 करोड़ मजदूर असंगठित क्षेत्र में हैं जिन्हें न तो न्यूनतम मजदूरी प्राप्त है न ही मौलिक अधिकार। छः करोड़ बाल श्रमिकों में से अधिकांश की उम्र छह से चौदह वर्ष है जिनसे डंडे दिखाकर 16 से 18 घंटे मात्र रोटी और नमक पर काम लिया जाता है। वयस्क बेरोजगारों की संख्या तो छह करोड़ से भी ज्यादा है।

स्वामी अग्निवेश ने केन्द्र सरकार के समक्ष अपनी मांग फिर से रखी है और सभी राजनीतिक दलों से भी आग्रह किया है कि वे इसे चुनावी मुद्दा बनाएं ताकि बंधुआ मुक्ति को सभी राजनीतिक पार्टियां अपने घोषणापत्र में शामिल करें। इस उद्देश्य से उन्होंने मार्च में एक परिचर्चा आयोजित की जिसमें सारे राजनीतिक दलों के प्रमुख नेताओं को आमंत्रित किया। भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के ए.बी. वर्धन ने स्वीकार किया कि राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी के कारण इस काम में तेजी नहीं आ पायी। कांग्रेस (इ) के बुद्धप्रिय मौर्य ने कहा कि यह काम तो काफी पहले कर लिया जाना चाहिए था। उन्होंने एलान किया कि अगर इस बार चुनाव घोषणापत्र में बंधुआ उन्मूलन शामिल नहीं किया गया तो वे घोषणापत्र समिति से इस्तीफा दे देंगे। जनता दल के रामविलास पासवान और मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के हरकिशन सिंह सुरजीत ने भी अपने चुनाव घोषणापत्र में यह मुद्दा शामिल करने का आश्वासन दिया।

स्वामी अग्निवेश ने सर्वप्रथम रोजगार योजना तुरंत लागू करने की मांग की है ताकि राष्ट्रीय न्यूनतम मजदूरी अधिनियम लागू करके प्रत्येक मजदूर को साल में दो सौ दिनों का रोजगार दिया जाये और उसकी दैनिक मजदूरी चतुर्थ श्रेणी के सरकारी कर्मचारी के पहले दिन की पगार के बराबर हो (वर्तमान में 75 रुपये)। मजदूरी के लिए मजबूर इन दरिद्र बच्चों के सामाजिक स्तर को ऊंचा उठाने के लिए इन्हें मुफ्त शिक्षा प्रदान करना राष्ट्रीय प्राथमिकता हो। इसके लिए बंधुआ मुक्ति मोर्चा की ओर से प्रत्येक स्कूल जाने वाले बच्चे को एक किलोग्राम खाद्यान्न रोजाना दिये जाने का प्रावधान रखा गया जो कई जगह सफलतापूर्वक कार्यान्वित किया जा रहा है। इससे बच्चे का आर्थिक बोझ उठा पाने में असमर्थ मां-बाप उन्हें स्कूल भेजने में रुचि लेंगे और जो बच्चा थोड़ा साक्षर हो जायेगा वह शोषण करने वाले कालीन और चूड़ी उद्योगों के दलालों के झांसे में नहीं आ पायेगा। बिहार के मुख्यमंत्री लालू प्रसाद ने कुछ समय तक हरिजनों और मंत्रियों को बस्ती में घूम-घूम कर प्रत्येक स्कूल जाने वाले बच्चे को एक रुपया रोज देने और स्कूल न भेजने वाले मां-बाप को जेल भेजने की घोषणाएं कीं, जो काफी असरदार साबित हुईं।

इन मांगों के प्रभावी ढंग से कार्यान्वयन के लिए स्वामी अग्निवेश ने बंधुआ और बाल मजदूरी मुक्ति के लिए एक राष्ट्रीय आयोग बनाने का भी प्रस्ताव केन्द्र सरकार से किया है तथा कहा है कि आयोग को वे सारे अधिकार दिये जाएं जो बंधुआ मजदूरी (उन्मूलन) अधिनियम, 1976 के तहत जिला मजिस्ट्रेटों को दिये गये हैं ताकि आयोग प्रभावी ढंग से अपना काम कर सके।

भदोही (बनारस) के एक कालीन उद्योग के मालिक ने नाम न छापने की शर्त पर कहा, 'क्या बात करते हैं साब, हम क्या इन्हें बुलाने जाते हैं, दस की जरूरत रहती है तो सौ आने को तैयार हो जाते हैं और इनके मां-बाप आरजू-मिन्नतें करने लगते हैं कि कम-से-कम भर पेट खाना तो मिलेगा, यहां तो दाने-दाने को मर रहे हैं और मजबूरी में लाना पड़ता है। कालीन उद्योग वाले उतने को यहां से काम देंगे, इसलिए कम मजदूरी देकर ज्यादा से ज्यादा बच्चों से काम कराया जाता है, उस पर ये बंधुआ मुक्ति मोर्चा वाले आकर बीच-बीच में धौंस दिखाते हैं, लेकिन उनसे यह नहीं होगा कि इन बच्चों के लिए उनके गांव में भरपेट खाने का इंतजाम करें। कितनी बार ऐसा हुआ है कि बंधुआ मुक्ति मोर्चा द्वारा कालीन उद्योग का काम छुड़ाकर गांव भेजे गये बच्चे फिर से वापस आ गए।' (प्रेट्रू)