बेगम खालिदा जिया का जैसे-तैसे चुनाव जीत कर आना बांग्लादेश की जनता को अच्छा नहीं लगा, क्योंकि उसमें पुलिस और प्रशासन पर बड़े पैमाने पर धांधली करने के लिए दबाव डाला गया। लेकिन विपक्ष ने इसे कुबूल नहीं किया। चूंकि जनता चुनावी धांधली से खिन्न थी, जो कील-कांटा दुरुस्त होने के लिए पर्याप्त था, बस संपूर्ण विपक्ष ने इसे आंदोलन का मुद्दा बना दिया। विपक्षी नेता आवामी लीग की अध्यक्ष शेख हसीना वाजेद के नेतृत्व में जमायते इसलामी और जातीय पार्टी ने मिलकर एक मंच बनाया व सरकार के साथ बिलकुल असहयोगपूर्ण रवैया अपनाने की ठान ली।
शेख हसीना ने संसद के सत्र के पहले ही दिन मांग रखी कि प्रधानमंत्री बेगम जिया ने गड़बड़ी करके चुनाव जीता है, इसलिए वे इस्तीफा देकर नया जनादेश प्राप्त करें, अन्यथा उनकी सरकार का कोई कामकाज चलने नहीं दिया जाएगा। विपक्ष के सभी 147 सांसद शेख हसीना के साथ सदन से बाहर निकल गए और उसके बाद से लगातार चार वर्षों तक यही सिलसिला चला। जनमत उनके पक्ष में था ही जिसका पूरा-पूरा लाभ विपक्ष ने उठाया और पिछले पांच वर्षों में शायद ही कोई दिन गुजरा जब बंद, हड़ताल, तालेबंदी, धरना, प्रदर्शन वगैरह के चलते संपूर्ण जनजीवन अस्त-व्यस्त न हुआ हो। लेकिन यह सारा कुछ बेगम जिया के लिए चिंता का कारण नहीं बन रहा था। देश में आंदोलन अपने चरम पर पहुंच रहा था, पर बेगम जिया तो क्या, उनकी सरकार का कोई मंत्री भी इस्तीफा देने के पक्ष में नहीं था।
तब विपक्षी नेताओं ने आंदोलन का रुख बदला और 147 सांसदों ने एक साथ संसद की सदस्यता से इस्तीफा दे दिया और पहली मार्च से संसद की बैठकों का बहिष्कार शुरू कर दिया। विपक्ष की एक ही मांग थी कि बेगम जिया ने अगर चुनाव की तारीख से 90 दिन पूर्व इस्तीफा नहीं दिया तो विपक्षी पार्टियां चुनाव में हिस्सा नहीं लेंगी। अभी तक तो किसी तरह काम चल रहा था, लेकिन सारे विपक्षी सांसदों के इस्तीफे और सदन के बहिष्कार से एक नया संकट खड़ा हो गया, जिसके लिए बेगम जिया तैयार नहीं थीं।
अध्यक्ष शेख रज्जाक अली के लिए संसद की कार्यवाही चलाना कठिन था। न तो वे इतने सांसदों का इस्तीफा सामूहिक रूप से मंजूर करने की स्थिति में थे, न ही उनकी गैर-मौजूदगी में सदन की कार्यवाही चलाना वैधानिक होता। सरकार इस्तीफा दिए बिना विपक्ष से बातचीत करके कोई हल निकालने के पक्ष में थी और कई मंत्रियों ने इस दिशा में पहल भी की। लेकिन शेख हसीना ने स्पष्ट कर दिया कि उनकी सरकार के किसी मंत्री से कोई बातचीत उनके सत्ता से हटने के बाद ही संभव है।
राष्ट्रपति की राय ली गई, सर्वोच्च न्यायालय की राय ली गई। सबकी ओर से यही सुझाव आया कि विपक्ष को विश्वास में लेकर ही अनुकूल स्थिति कायम की जा सकती है। राष्ट्रपति अब्दुर्रहमान विश्वास के बुलावे पर जुलाई 1995 में विपक्षी दलों का एक प्रतिनिधिमंडल उनसे मिला, पर कोई नतीजा नहीं निकला। प्रतिनिधिमंडल ने कहा कि चूंकि बेगम जिया के सत्ता में रहते हुए स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव संभव नहीं है, इसलिए चुनाव से संबंधित कोई बातचीत उनके इस्तीफे के बाद ही हो सकती है, और वह भी उनसे नहीं, कामचलाऊ सरकार से होगी।
बेगम जिया प्रधानमंत्री पद से इस्तीफा देकर विपक्ष की हर मांग मानने को तैयार थीं, लेकिन विपक्ष को सिर्फ उनका इस्तीफा चाहिए था। इसी चक्कर में 1995 गुजर गया और बेगम जिया ने अपने पद पर बने रहकर नए आम चुनाव की तैयारी शुरू कर दी। लेकिन न तो बेगम जिया ने, न ही उनकी बांग्लादेश नैशनलिस्ट पार्टी के किसी मंत्री ने जनता के रुख की टोह लेने की कोशिश की।
इसके विपरीत आवामी लीग, जमायते इसलामी, पूर्व राष्ट्रपति जनरल हुसैन मोहम्मद एरशाद की जातीय पार्टी और छोटे-छोटे दलों ने पिछले पांच वर्षों में जनता के बीच घूम-घूमकर जनमत की नब्ज पहचान ली थी जो असरदार साबित हुई। विपक्ष को कोई नए सिरे से मोर्चाबंदी तो करनी नहीं थी; चुनाव परिणामों की घोषणा होते-होते पूरे देश में बावेला मच गया और काबू पाने की सरकार की कोई दमन-नीति कामयाब नहीं हो सकी।
सबसे बुरी स्थिति बेगम जिया के सामने तब आ गई जब सारे सरकारी कर्मचारी अपने-अपने दफ्तरों से बाहर निकल आए और प्रधानमंत्री के इस्तीफे की मांग करने लगे। पूरे देश में एक ही नारा था कि बेगम जिया सत्ता से हटकर कामचलाऊ सरकार के गठन का मार्ग प्रशस्त करें। जब बेगम जिया को पूरी तरह महसूस हो गया कि सरकार चलाना असंभव है, तो आखिरकार हार-थककर 30 मार्च को उन्होंने इस्तीफा दिया और संसद भंग कर दी गई।