बंगलादेश में अमूमन वैसी ही परिस्थितियां बनती जा रही हैं जैसी 1991 के आम चुनाव के बाद पैदा हुई थीं जब वर्तमान प्रधानमंत्री शेख हसीना वाजेद की पार्टी अवामी लीग बहुमत हासिल करने में कामयाब नहीं हो पायी और बी.एन.पी. (बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी) की नेता बेगम खालिदा जिया को सत्ता में आने का अवसर मिला। अभी विपक्षी नेता बेगम जिया ने 12 जून के चुनाव को अवैध करार दिया और शेख हसीना पर बड़े पैमाने पर धांधली करके अपनी पार्टी के उम्मीदवारों को जिताने के आरोप लगाकर उनके खिलाफ जनमत तैयार करने की धमकी दी। पहले तो उन्होंने इस संबंध में पूछे गये सवालों के जवाब में कहा कि शेख हसीना की तरह संसद का बहिष्कार करने की उनकी कोई योजना नहीं है, लेकिन अब खालिदा जिया वे सारे हथकंडे अपना रही हैं जो उन्हें अपदस्थ करने के लिए शेख हसीना ने उनके पूरे शासनकाल के दौरान अपनाया।

खालिदा जिया ने अपनी मंशा का संकेत दे दिया 23 जून को, जब उन्होंने प्रधानमंत्री के रूप में शेख हसीना के शपथ ग्रहण समारोह का बहिष्कार किया और उसके बाद तत्कालीन राष्ट्रपति अब्दुर्रहमान विश्वास से अपने पुराने सम्बन्ध का लाभ उठाकर नयी संसद के पहले सत्र के पहले दिन ही बी.एन.पी. के लिए अजीबोगरीब स्थिति पैदा कर दी। शेख हसीना ने राष्ट्रपति के अभिभाषण में अपने पिता बंगबंधु शेख मुजीबुर्रहमान का नाम जोड़ा था और देश की आजादी की लड़ाई में उनके योगदान का जिक्र किया था। चूंकि राष्ट्रपति का अभिभाषण पूरी तरह सरकार का वक्तव्य और भावी कार्यकलापों का लेखाजोखा होना है, इसलिए शेख हसीना ऐसा क्यों सोचतीं कि इसमें भी उनकी कट्टर प्रतिद्वंद्वी बेगम जिया कुछ गुल खिला सकती हैं। लेकिन हुआ उनकी आशा के प्रतिकूल। राष्ट्रपति ने अपने अभिभाषण में फेरबदल कर दिया और शेख मुजीब के नाम तक का जिक्र नहीं किया। प्रधानमंत्री को यह बात बड़ी नागवार गुजरी और उन्होंने संवैधानिक परंपरा के अनुरूप अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव पेश नहीं किया। इस सम्बन्ध में विपक्ष की मांग सरकार ने सीधे-सीधे ठुकरा दी। उसी समय से श्री विश्वास से उनके मतभेद बढ़ते चले गये और स्थिति तभी सामान्य हो पायी जब अक्तूबर में विश्वास की जगह पूर्व मुख्य न्यायाधीश शहाबुद्दीन अहमद ने ले ली। श्री विश्वास के बारे में पहले भी बेगम खालिदा की तरफदारी करने के आरोप हैं जब वह सत्ता में थीं।

फिर नवंबर के पहले सप्ताह में सत्र आहूत किया गया और सरकार ने 1975 के खूनी सैनिक तख्तापलट में शामिल लोगों के खिलाफ कार्रवाई करने के लिए संसद में इस आशय का एक विधेयक लाने की तैयारी शुरू कर दी। उसी तख्तापलट में शेख मुजीब और उनके परिवार के सभी सदस्यों की हत्या करके वरिष्ठ जनरल खोंडकर मुश्ताक अहमद ने सत्ता हथिया ली। शेख हसीना अगर बंगलादेश से बाहर न होतीं तो शायद वह भी जीवित नहीं बचतीं।

बेगम खालिदा नहीं चाहती थीं कि यह विधेयक संसद में पेश हो और सरकार को '1975 तख्तापलट' में शामिल जनरलों के खिलाफ मुकदमा चलाने का व्यापक अधिकार मिले, क्योंकि उनके पति मरहूम जियाउर्रहमान इन्हीं जियाउर्रहमान के नजदीकी मित्र हुआ करते थे। बेगम खालिदा को डर है कि इसका खामियाजा उन्हें भी भुगतना पड़ सकता है, क्योंकि शेख हसीना ने सत्ता में आने के तुरंत बाद ही अपने पिता के हत्यारों के खिलाफ कार्रवाई शुरू कर दी। पहले तो उन्होंने वैसे राजदूतों को स्वदेश बुलाकर उन्हें अपने-अपने घरों में नजरबंद किया और इस महीने सात सैनिक अधिकारियों को गिरफ्तार किया गया है जिनके खिलाफ मुकदमा चलाया जा रहा है। इनमें से पांच ऐसे हैं जिनके खिलाफ उस हत्याकांड में शामिल होने के पक्के सबूत मिल चुके हैं। इसलिए बेगम खालिदा की नाराजगी अस्वाभाविक नहीं है। अवामी लीग सरकार ने 10 नवम्बर को संसद में विधेयक पेश करना तय किया और उसी हिसाब से बेगम खालिदा ने भी अपनी योजना को अंजाम दिया। 10 तारीख को शेख हसीना ने विधेयक पेश किया और उसी दिन से बेगम खालिदा और उनकी बंगलादेश नेशनलिस्ट पार्टी के तमाम सदस्यों द्वारा सत्र का बहिष्कार जारी है। संसद में लौटने की शेख हसीना की अपील विपक्षी सांसद ठीक वैसे ही ठुकरा रहे हैं जैसे पिछले वर्ष अवामी लीग के नेतृत्व में सभी दलों को मिलाकर बने संयुक्त मोर्चा के सांसदों ने बेगम खालिदा की अपील ठुकरा दी थी।

राष्ट्रपति शहाबुद्दीन अहमद से शेख हसीना और बेगम खालिदा दोनों ने इस संकट का समाधान निकालने में हस्तक्षेप का आग्रह किया है। श्री अहमद न्यायविद होने के साथ-साथ अनुभवी राजनीतिज्ञ भी हैं, क्योंकि अब्दुर्रहमान विश्वास ने भी पांच साल पहले इन्हीं से कार्यभार ग्रहण किया था। 19 नवम्बर को विपक्षी नेता बेगम खालिदा ने राष्ट्रपति से भेंट की और शिकायत रखी कि उनकी पार्टी के सांसदों को विधेयक पर बोलने का अवसर नहीं दिया गया। बेगम खालिदा ने बहिष्कार को 'संसदीय हड़ताल' का नाम दिया और पुलिस पर अपनी पार्टी के समर्थकों तथा कार्यकर्ताओं के साथ बदसलूकी करने का आरोप लगाया। न्यायमूर्ति अहमद ने उन्हें आश्वासन दिया कि वे शेख हसीना से बात करेंगे ताकि दोनों पक्षों में ऐसे कुछ मुद्दों पर सहमति हो जाए जिससे संसद का कामकाज ठीक से चल पाए। राष्ट्रपति ने यह भी कहा कि पिछले वर्ष की पुनरावृत्ति नहीं होनी चाहिए, क्योंकि वह बड़ी दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति होगी।

उस समय प्रधानमंत्री विश्व खाद्य सम्मेलन में भाग लेने रोम गयी थीं। लौटने के बाद उनकी राष्ट्रपति से मुलाकात हुई। राष्ट्रपति के ही इशारे पर 21 नवंबर को सेना दिवस पर बेगम खालिदा और शेख हसीना दोनों को आमंत्रित किया गया। समारोह के मंच पर दोनों नेताओं को बड़े सौहार्दपूर्ण भाव से मिलते और बात करते देखा गया, लेकिन अभी तक न तो खालिदा, न ही बी.एन.पी. के अन्य कोई सांसद सदन में लौटे हैं। सदन सत्र में है और एक हफ्ते तक स्थगित रहने के बाद 19 नवम्बर से ही कार्यवाही फिर शुरू हुई है। खालिदा ने कहा तो है कि वह शीघ्र संसद में लौटेंगी, क्योंकि वह शेख हसीना जैसी स्थिति नहीं आने देना चाहतीं, पर वह यह नहीं बता रही हैं कि इसी सत्र में लौटेंगी अथवा अगले सत्र में ही विचार करेंगी।

यह चिन्ता का विषय इसलिए भी है कि बी.एन.पी. अपने ही बलबूते पर एक सशक्त विपक्ष है और अवामी लीग को पूर्व राष्ट्रपति लेफ्टिनेंट जनरल हुसैन मुहम्मद इरशाद की जातीय पार्टी और जमात-ए-इस्लामी के समर्थन की बदौलत बहुमत मिला हुआ है। 1991 में जब अवामी लीग ने बेगम खालिदा के खिलाफ आन्दोलन छेड़ा था तो उसे अन्य दलों का सहयोग लेना पड़ा था। पिछले वर्ष फरवरी में जिन 147 सांसदों ने सामूहिक इस्तीफा देकर संसद का बहिष्कार करने का फैसला किया उनमें अवामी लीग के अलावा अन्य दलों के सदस्य भी थे।

खालिदा जिया को जातीय पार्टी से पुरानी खंदक है, क्योंकि मुहम्मद इरशाद ने उनके पति की हत्या करवाकर सत्ता पर कब्जा जमाया था और आज जातीय पार्टी सत्तारूढ़ दल के साथ है। अभी मुहम्मद इरशाद भ्रष्टाचार के कई मामलों में जेल में बन्द हैं, पार्टी का नेतृत्व उनकी बेगम रोशन इरशाद के जिम्मे है। दोनों ही संसद सदस्य हैं। बेगम रोशन इरशाद को उम्मीद है कि उनके पति के ऊपर से वे सारे मुकदमे उठा लिये जायेंगे जिन्हें चुनावी मुद्दा बनाकर बेगम खालिदा सत्ता हथियाने में सफल हुई थीं। ढाका के अखबार 'भोरेर कागज' के मुताबिक शेख हसीना और मुहम्मद इरशाद के बीच चुनाव से पहले ऐसी 'अंडरस्टैंडिंग' हुई थी, लेकिन ढाका उच्च न्यायालय द्वारा हाल में ही मुकदमों में इरशाद को जमानत देने से इंकार कर दिये जाने से शेख हसीना थोड़ी उलझन में पड़ गयी हैं। इरशाद को संसद में आने के लिए भी उन्हें 'विशेष अनुमति' देनी पड़ी थी।

यह भी एक इत्तेफाक ही है कि बंगलादेश की दोनों प्रमुख पार्टियों के साथ देश की स्थिति संवेदनशील बनी हुई है। शुक्र है बेगम खालिदा ने अभी तक शेख हसीना से इस्तीफा देकर पुनः चुनाव कराने की मांग नहीं की है। चुनाव की तारीख से 30 दिन पहले इस्तीफा देने की मांग को लेकर शेख हसीना ने पूरे पांच साल आन्दोलन चलाया और एक साल तक संसद का बहिष्कार किया तब जाकर उनकी मुराद पूरी हुई। वैसे बेगम खालिदा ने जनान्दोलन का आधार तैयार करना शुरू कर दिया है और शेख हसीना की तरह वह भी भारत के साथ 1972 में हुई 25-सालाना मैत्री संधि को 'भारत के आगे घुटने टेकने वाला करारनामा' बता रही हैं जिसकी वजह से अगले वर्ष इसके नवीकरण का मामला विवादास्पद हो गया है।