भारत के पड़ोस में स्थित बांग्लादेश में इस वर्ष मार्च से शुरू हुए संवैधानिक संकट सुलझने के आसार नजर नहीं आ रहे हैं, जबकि प्रधानमंत्री बेगम खालिदा जिया ने अपने पद से इस्तीफा देना छोड़कर बाकी सब उपाय आजमाकर देख लिए। दूसरी ओर बांग्लादेश की विपक्षी पार्टियों की नजर में सामान्य स्थिति बहाल करने के लिए प्रधानमंत्री के इस्तीफे के सिवाए और कोई रास्ता नहीं है।
दरअसल बांग्लादेश के प्रमुख विपक्षी दल अवामी लीग, जातीय पार्टी और जमायत-ए-इस्लामी ने पिछले आम चुनाव (1991) में ही बेगम खालिदा जिया की बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (बीएनपी) पर बड़े पैमाने पर धाँधली करके वोट हथियाने का आरोप लगाया। उसी समय सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी अवामी लीग की अध्यक्षा शेख हसीना वाजेद ने बेगम खालिदा से इस्तीफा देकर नया जनादेश प्राप्त करने की माँग की। सारे विपक्षी दल इस माँग से सहमत थे लेकिन प्रधानमंत्री पद से इस्तीफा देना बेगम खालिदा को मंजूर नहीं था, न ही उनकी सत्तारूढ़ पार्टी के कोई नेता सरकार से हटने के पक्ष में थे। परिणाम यह हुआ कि विपक्षी पार्टियों ने आपस में एकजुटता कायम करके सरकार का काम बिल्कुल न चलने देने की ठान ली। इसके लिए पहले तो पूरे देश में जनमत तैयार किया गया और फिर संसद में संवैधानिक संकट पैदा करने का फैसला किया गया। तयशुदा कार्यक्रम के अनुसार विपक्ष के 147 सांसदों ने इस वर्ष फरवरी में अध्यक्ष शेख रज्जाक अली को अपना सामूहिक इस्तीफा सौंप दिया और 1 मार्च से संसद की बैठकों का बहिष्कार शुरू कर दिया। इन सांसदों की एक ही माँग थी कि संसद भंग करके तत्काल चुनाव कराया जाए और अगर प्रधानमंत्री ने चुनाव से 90 दिन पहले अपने पद से इस्तीफा न दिया तो कोई भी विपक्षी पार्टी चुनाव में हिस्सा नहीं लेगी। चुनाव होने तक संसद की बैठक में शामिल न होने की रणनीति तो पहले ही तय हो चुकी थी।
बेगम खालिदा जिया सत्ता से हटने को राजी तो हैं, लेकिन उनका कहना है कि वे चुनाव से ठीक 30 दिन पूर्व इस्तीफा देंगी। चुनाव अगले वर्ष मार्च-अप्रैल में होना तय है। बांग्लादेश के संविधान में किसी एक अथवा उससे अधिक सदस्यों द्वारा 90 दिनों तक लगातार संसद की बैठकों में शामिल न होने पर उन सांसदों द्वारा प्रतिनिधित्व की जाने वाली सीटों को रिक्त घोषित करके उपचुनाव कराए जाने का प्रावधान है। 147 सांसदों के बहिष्कार के 90 दिन 19 जून को पूरे हो गए, लेकिन उसके काफी दिनों बाद तक अध्यक्ष रज्जाक अली कुछ भी फैसला लेने की स्थिति में नहीं थे। इन सांसदों का इस्तीफा उन्होंने पहले ही नामंजूर कर दिया था। ऐसी अभूतपूर्व स्थिति पैदा हो जाने की किसी ने कल्पना नहीं की थी। प्रधानमंत्री, उनके सभी विभागीय मंत्री और बीएनपी के वरिष्ठ नेता सबके सब परेशान रहे कि इस संकट का हल कैसे निकाला जाए।
तकरीबन एक महीने तक डाँवाडोल की स्थिति बनी रही। प्रधानमंत्री और रज्जाक अली कई कारणों से पसोपेश में रहे। आम चुनाव का समय नजदीक होने के कारण वे एक साथ 147 सीटों के उपचुनाव का खर्च जनता पर नहीं डालना चाहते थे, जबकि देश की आर्थिक हालत पहले से ही चरमराई हुई है। संवैधानिक प्रावधानों का उल्लंघन हो रहा था क्योंकि अध्यक्ष के लिए तमाम विपक्षी सांसदों का इस्तीफा मंजूर करके उन सीटों को रिक्त घोषित करना और विपक्ष की गैर-मौजूदगी में सरकार का कामकाज चलाना कुछ भी संभव नहीं हो पा रहा था। विपक्ष के शामिल न होने की स्थिति में चुनाव कराना भी सरकार को असंगत जान पड़ रहा था। ढाका उच्च न्यायालय की एक खंडपीठ ने बहिष्कार को गैरकानूनी बताकर विपक्षी सांसदों को संसद में लौटने का निर्देश दिया, जिसे सदस्यों ने नहीं माना।
आखिरकार सुप्रीम कोर्ट की मदद ली गई और अध्यक्ष ने सुप्रीम कोर्ट की राय से 147 सीटों को जुलाई के मध्य में रिक्त घोषित करने का नियमन दिया और आम चुनाव के साथ ही सभी सीटों का चुनाव कराना तर्कसंगत बताया। विपक्षी सांसद तो यही चाहते थे, इसलिए संविधान के तहत बहिष्कार के 90 दिन पूरे होने के बाद से राष्ट्रव्यापी आंदोलन में जुट गए ताकि सरकार पर शीघ्र संसद भंग करके चुनाव कराने का दबाव डाला जा सके। संसद में लौटने का आग्रह वे पहले ही ठुकरा चुके हैं।
जुलाई के बाद से स्थिति लगातार खराब होती जा रही है। तीन प्रमुख विपक्षी दल एक ही उद्देश्य को लेकर संघर्ष पर उतारू हैं और अन्य छोटे दल भी उनके साथ हैं। विपक्ष को मिल रहे व्यापक जनसमर्थन को देखकर सत्तारूढ़ बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी को अपना भविष्य अनिश्चित नजर आ रहा है। पूरे देश में बंद, हड़ताल, चक्काजाम, काला दिवस, प्रदर्शन, धरना और अनशन का सिलसिला बदस्तूर जारी है। जनता की उग्र और हिंसा पर उतारू भीड़ को देखकर पुलिस तथा प्रशासनिक अधिकारी लाचार होते जा रहे हैं। सरकारी कार्यालयों, कारखानों और अन्य व्यावसायिक प्रतिष्ठानों में कामकाज तकरीबन ठप है। घायलों और जेलों में ठूंसे गए लोगों की संख्या सैकड़ों में है। बांग्लादेश की आय का मुख्य स्रोत जूट और वस्त्र कारखानों में तालाबंदी की स्थिति है।
विपक्षी सांसद अब अपनी दो माँगों पर अड़े हैं। पहली माँग है कि बेगम खालिदा जिया तुरंत इस्तीफा देकर चुनाव कराएँ और चुनाव होने तक के लिए सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश के नेतृत्व में एक कामचलाऊ सरकार का गठन किया जाए। बेगम खालिदा जिया अभी भी ऐसा कोई रास्ता निकालने की जुगाड़ में हैं ताकि विपक्षी पार्टियाँ चुनाव में शामिल होने को तैयार हो जाएँ और चुनाव से 30 दिन पहले इस्तीफा देने की उनकी बात भी रह जाए। बेगम जिया की ओर से उनकी पार्टी के महासचिव और स्थानीय स्वशासन मंत्री अब्दुस्सलाम तलुकदर ने विपक्षी सांसदों को बातचीत के लिए बुलावा भेजा जिसके जवाब में सभी विपक्षी पार्टियों के संयुक्त मोर्चे की प्रधान शेख हसीना वाजेद ने दो शर्तें रखीं। पहली शर्त थी कि प्रधानमंत्री के इस्तीफे के बाद ही उनसे कोई बातचीत संभव है और विपक्षी पार्टियाँ चुनाव में तभी शामिल होंगी, जब बेगम खालिदा 90 दिन पहले कामचलाऊ सरकार के हाथ में सत्ता सौंपकर चुनाव कराने की जिम्मेदारी से खुद को मुक्त कर लें। अपनी शर्तें मनवाने के लिए सरकार पर दबाव डालने के इरादे से शेख हसीना वाजेद ने पूरे देश की अवाम से तब तक अस्त-व्यस्तता की स्थिति कायम रखने का आह्वान किया है, जब तक कि सरकार इस्तीफा देकर बातचीत को न तैयार हो जाए।
बेगम जिया के बारे में प्रचार है कि वे संवैधानिक राजनीति में गहरी आस्था रखने वालों में से हैं। उनका इस बात का भी दावा है कि उनकी पार्टी को जनसमर्थन किसी भी अन्य पार्टी से ज्यादा है। इसलिए दो साल से बेगम खालिदा जिया सर्वमान्य हल निकालने के लिए प्रयत्नशील हैं, जबसे विपक्ष ने असहयोगपूर्ण रुख अपनाया है। विपक्ष का कहना है कि उसी स्थिति में स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव होना संभव है, जब 30 दिन पहले सत्ता किसी कामचलाऊ सरकार के हाथ में सौंपकर बेगम खालिदा जिया प्रधानमंत्री पद से हट जाएँ, क्योंकि पिछले पाँच वर्षों में उन्होंने पूरे सरकारी तंत्र को अपने ढंग से ढाल लिया है, जिसे निष्पक्ष सोच वाला बना पाना इससे कम समय में असंभव है। दूसरी ओर बेगम खालिदा जिया का कहना है कि अब तक विपक्ष ने सरकार के हर काम में अड़ंगा लगाया है और अगर इतने दिनों तक देश में मजबूत सरकार न रही तो अराजक स्थिति कायम हो जाएगी, जो विपक्ष का मुख्य उद्देश्य है।
मामला 30 दिन और 90 दिन के बीच अटका है। सत्ता के इस खेल में जनसाधारण पिस रहा है। बांग्लादेश के आकंठ विदेशी कर्ज में डूबे होने के कारण महँगाई पहले ही आसमान छू रही है, अब एक भी दिन सामान्य ढंग से कामकाज न चल पाने के कारण सबसे बुरी गत हो रही है, रोजमर्रा की कमाई से पेट चलाने वाले मजदूर वर्ग की। 18 सितंबर को समाप्त 72 घंटे के बंद के दौरान पूरे देश में वीरानी देखी गई। ढाका से प्राप्त एक रिपोर्ट के अनुसार रिक्शा चालक कलीम मियाँ के पूरे परिवार को एक दिन सिर्फ पानी पीकर रात गुजारनी पड़ी। चाय और किराना की सारी दुकानें बंद होने के कारण घर का कोई आदमी चाय तक नहीं पी पाया। पानी संयोगवश बंद शुरू होने से पहले से घर में रखा था, वर्ना वो भी न नसीब होता, क्योंकि बंद के दौरान जल आपूर्ति भी बाधित रही। गरीब और कमजोर तबके के लोग विपक्ष के इस वायदे पर उम्मीद लगाए हैं कि अब जो सरकार बनेगी, वो सबसे पहले महँगाई पर काबू पाने की हरसंभव कोशिश करेगी।
उधर बेगम जिया किसी भी कीमत पर सत्ता से हटने को तैयार नहीं हैं, जबकि वे यह भी अच्छी तरह महसूस कर रही हैं कि विपक्ष की भागीदारी के बिना चुनाव कराना बेमतलब का और म्यांमार जैसा हो जाएगा। बांग्लादेश पाकिस्तान की गिरफ्त से मुक्ति (1971) के बाद से ही आंतरिक उथल-पुथल के दौर से गुजर रहा है, जिसकी शुरूआत हुई बांग्लादेश की आजादी में मुख्य भूमिका निभाने वाले बंगबंधु शेख मुजीबुर्रहमान समेत उनके परिवार के तमाम सदस्यों की हत्या से। शेख मुजीब की पुत्री हसीना वाजेद अगर देश से बाहर न होतीं तो शायद वो भी जिंदा नहीं बच पातीं। उसके बाद तो एक को मारकर दूसरे द्वारा सत्ता हथियाने का सिलसिला चला। बेगम खालिदा जिया के पति जियाउर्रहमान को पदच्युत करके अब तक के सबसे बदनाम शासक एच.एम. इरशाद ने करोड़ों रुपए सिर्फ अपने ऐशो-आराम पर खर्च कर दिया। बेगम जिया ने उन्हें हटाकर सत्ता में बने रहने के लिए सभी जनतांत्रिक मूल्यों का गला घोंट दिया। आज तक इस देश के किसी शासक ने जनता के हितों का ख्याल नहीं किया।